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19 सित॰ 2017

बड़े बदलाव की छोटी शुरुआत।(small start of big change)

By: Successlocator On: सितंबर 19, 2017
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  • एक लड़का सुबह सुबह दौड़ने को जाया करता था | आते जाते वो एक बूढी महिला को देखता था |वो बूढी महिला तालाब के किनारे छोटे छोटे कछुवों की पीठ को साफ़ किया करती थी |
    एक दिन उसने इसके पीछे का कारण जानने की सोची |
    वो लड़का महिला के पास गया और उनका अभिवादन कर बोला ” नमस्ते आंटी !
    मैं आपको हमेशा इन कछुवों की पीठ को साफ़ करते हुए देखता हूँ
    आप ऐसा किस वजह से करते हो ?”  महिला ने उस मासूम से लड़के को देखा और  इस पर लड़के को जवाब दिया ” मैं हर रविवार यंहा आती हूँ और इन छोटे छोटे कछुवों की पीठ साफ़ करते हुए सुख शांति का अनुभव लेती हूँ |क्योंकि इनकी पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचरा जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है
    इसलिए ये कछुवे तैरने में मुश्किल का सामना करते है | कुछ समय बाद तक अगर ऐसा ही रहे तो ये कवच भी कमजोर हो जाते है

    इसलिए कवच को साफ़ करती हूँ |

    यह सुनकर लड़का बड़ा हैरान था | उसने फिर एक जाना पहचाना सा सवाल किया और बोला “बेशक आप बहुत अच्छा काम कर रहे है लेकिन फिर भी आंटी एक बात सोचिये कि इन जैसे कितने कछुवे है जो इनसे भी बुरी हालत में है जबकि आप सभी के लिए ये नहीं कर सकते
    तो उनका क्या क्योंकि आपके अकेले के बदलने से तो कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा न |
    महिला ने बड़ा ही संक्षिप्त लेकिन असरदार जवाब दिया: भले ही मेरे इस कर्म से दुनिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा
    लेकिन सोचो इस एक कछुवे की जिन्दगी में तो बदलाव आएगा ही न | तो क्यों हम छोटे बदलाव से ही शुरुआत करें |

    अगर आप कोई लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रहे हो तो तब तक ना रुको जब तक आप इसे प्राप्त ना कर लो । क्योंकि जब आप उस लक्ष्य को प्राप्त कर लोगे तो उसे जो आपको नींद आयेगी वो ऐसी होगी जो आपको कभी नही मिली थी

    कभी कभी दोस्तो के साथ स्कूल को बीच में छोड़कर भागना भी अच्छा रहता है - उनका कहना था कि अगर आपके अच्छे मार्क्स है तो वो आपको बड़े होने पर इतनी खुशी नही देंगे जितनी आपके दोस्तो के साथ बिताये वो अनमोल दिन देंगे ।

    कई लोगो को अपना लक्ष्य पत्ता होता है फिर भी वो टीवी ,इंटरनेट, सोशियल मीडीया ,आदि कि तरफ ज्यादा ध्यान देते है और अपना टाइम खराब कर लेते है। इसलिये आप इससे बचो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो ।
    हम कोई भी कार्य करते है तो हमको पता है किसी भी कार्य के बीच कठिनाई भी आयेगी , लेकिन आप इस परेशानी का हल निकाले और इसे हल करे। परेशानिया अपने आप चली जायेगी।

    17 सित॰ 2017

    भविष्य के बारे में ज्यादा न सोचें जानिए क्यों?

    By: Successlocator On: सितंबर 17, 2017
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  • एक बार एक देश के राजा ने मुल्ला नसीरूदीन को बुलाया और उस से पूछा कि तुम्हारे बारे में मैंने बहुत सुना है कि तुम बहुत चालाक हो इसलिए क्या तुम एक काम कर सकते हो जो मैं तुमसे कहने वाला हूँ।

    इस पर मुल्ला ने कहा मैं कुछ भी कर सकता हूँ बस आप एक बार आज्ञा दें। इस पर राजा ने कहा क्या तुम अपने इस प्रिय गधे को पढ़ना सिखा सकते हो इस पर मुल्ला ने कहा, हाँ क्यों नहीं मैं इसे आराम से सिखा सकता हूँ | इस पर राजा ने कहा ‘बकवास मत करो ‘ क्या गारंटी है तुम ऐसा कर सकते हो |

    मुल्ला ने जवाब दिया कि एक काम कीजिये आप मुझे पचास हजार स्वर्ण मुद्राएँ दीजिये उसके बाद मैं गारंटी लेता हूँ कि आठ साल के अंदर मैं इस गधे को पढना सिखा सकता हूँ इस पर राजा ने कहा अगर तुम ऐसा कर पाने में सफल नहीं होते हो तो मैं तुम्हे जेल में डाल दूंगा। मुल्ला ने हामी भर ली और वंहा से चला गया।

    घर आने के बाद मुल्ला से उसके एक दोस्त ने कहा ‘ मुल्ला तुमने ये क्या किया ? सब जानते है तुम ऐसा नहीं कर सकते फिर भी तुमने राजा को यह वचन दे दिया है क्या तुम्हे जेल जाने से डर नहीं लगता मुल्ला ने उत्तर दिया तुम इतना ज्यादा मत सोचो।

    क्योंकि आठ साल में तो या तो हमारा राजा नहीं रहेगा और हो सकता है मेरा गधा भी तब तक नहीं रहे लेकिन फिर भी अगर ऐसा होता है कि सात साल तक दोनों में से कोई भी नहीं जाता तो मेरे पास पूरा एक साल है कि मैं सोच सकता हूँ राजा की सज़ा से कैसे बचा जा सकता है।
    सोच ये ना रखें की मुझे रास्ता अच्छा मिले, बल्कि ये होना चाहिए कि मैं जहां पाव रखूं वो रास्ता अच्छा हो जाए. फर्क सिर्फ सोच का होता हैं सकारात्मक या नकारात्मक वरना सीढियां वही होती है जो किसी के लिए ऊपर जाती हैं, और किसी के लिए नीचे आती हैं साधारण और श्रेष्ठ में सिर्फ इतना सा अंतर है की साधारण उसको चुनते है जो आसान है लेकिन श्रेष्ठ उसे चुनता है जो मुश्किल है कोई फर्क नहीं पड़ता की लोग आपके बारे में क्या सोचते है, फर्क तो इससे पड़ता है की आप अपने बारे में क्या सोचते है  सफलता हमेशा अच्छे विचारों से आती हैं और अच्छे विचार अच्छे लोगों के सम्पर्क से आते हैं.

    16 सित॰ 2017

    प्रतापी राजा मान सिंह और उनके चार अड़ियल घोड़ो की प्रेरणादायक कहानी।

    By: Successlocator On: सितंबर 16, 2017
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  • राजा मानसिंह बहुत ही चिंता में पड़ गए थे। उनके चार अड़ियल घोड़े किसी कीमत पर तालिम सीख ही नहीं रहे थे। देश परदेश से कई तालिमार्थी आए और गए। कुछ लोग तो इसी चक्कर में हड्डियाँ भी तुड़वा बैठे। पर जंगली घोडे टस से मस नहीं हो रहे थे। कुछ दिन बाद राजा मानसिंह नें ऐलान कर दिया की जो भी इन घोड़ों को तालिम दे पाएगा उसे में एक घड़ा भर के सोने के सिक्के दूंगा। इनाम की खबर सुन कर एक नौजवान आगे आया। उसने घोड़ों को तालिम देने की चुनौती स्वीकार कर ली। और यह शर्त रखी की यह कार्य होने तक उसे घोड़ों के साथ दूर अकेला छोड़ दिया जाये।  

    करीब तीन माह तक वह आदमी घोड़ों को ले कर किसी अंजान जगह चला गया। अब राजा मानसिंह को लगा की वह नौजवान वापिस नहीं आएगा। और अब तक घोड़े उसके कब्ज़े से भाग भी चुके होंगे। तभी उन्हे घोड़ों के तलवों (खुर) की आवाज़ सुनाये देने लगी। उनके चारों घोड़े एक कतार में आराम से चलते हुए उसी के महल की और आ रहे थे। और उन पर लगाम और गद्दी भी लगी हुई थी।

    इसका मतलब साफ था की वह चारो घोड़े अब तालिम ले चुके थे। राजा मानसिंह यह देख कर अति प्रसन्न हुए। उन्होने उसी वक्त घोड़ो को अपने कब्ज़े में लिया और उस नवयुवक को उसका इनाम दे दिया।

    फिर राजा मानसिंह नें उसे पूछा की तुम इस कार्य में सफल कैसे हुए। यह घोड़े तो अच्छों अच्छों की हड्डियाँ तुड़वा चुके हैं। तब उस नौजवान नें कहा की, मैंने इन घोड़ो को मुक्त विचरने दिया। जिस से इनका तनाव दूर हो गया।

    फिर धीरे धीरे इन के करीब से गुजरने लगा ताकि यह मेरी मौजूदगी स्वीकार करना सीख लें। उसके बाद मै इनहि के चरने के समय पास बैठ कर भोजन करता, जब यह आँख बंद कर के खड़े खड़े सुस्ताते तो मै भी इनके पास खड़ा खड़ा आंखे बंद कर के सोने का नाटक करता।

    जब यह घोड़े मस्ती में खेलते दौड़ते तो मै भी इनके साथ उछलता कूदता। इस तरह मैंने धीरे धीरे इन सब का विश्वास जीता। फिर इन पर गद्दी बिछाना शुरू किया। पहले यह जटक देते थे। पर आहिस्ता आहिस्ता इन्हे मेरी आदत हो गयी।

    फिर में लगाम बांधने लगा। तो यह थोड़े विचलित हुए। लेकिन इन्हे इतना भरोसा हो चुका था की में इन्हे नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा तो मै इस कार्य में भी सफल हुआ। धीरे धीरे मैंने इन पर सवारी करना शुरू किया।

    कई बार गुस्से में इनहोने मुझे गिरा भी दिया। पर मैंने सैयम खो कर इन से दूरव्यवहार नहीं किया। बस विनम्रता से प्रयास करता रहा। और अंत में मै इन्हे अन्य लोगों के पास ले जा कर उनको भी सवारी करवाना शुरू किया। जिस से इन घोड़ों को लोगों का डर भी निकल गया। अब यह घोड़े पूरी तरह से तालिमबद्ध और शांत हो चुके हैं। मेरा कार्य खत्म हुआ।

    राजा मानसिंह इस नौयुवक की चतुराई भरी बातें सुन कर बहुत खुश हुए। उन्होनेनें उस युवक को एक और सोने के सिक्कों से भरा हुआ घड़ा दिया। और उसे अपने घोड़ों के अस्तबल में प्रमुख कर्मचारी बनाने की पेशकश भी करी। वार्ता समाप्त।

    कहानी का सार – मानवी के मन के अंदर भी चार घोड़े होते हैं। मानस, चिंता, अहम और बुद्धि। इन चार तत्व को काबू करना है तो बहुत सैयम से काम लेना चाहिए। जैसे इस कहानी के नौजवान नें लिया था।

    दोस्तों अगर आप भी इस कहानी के हीरो जैसे सफल होना चाहते हैं तो अपने मन से दोस्ती कर लो। पहले खुद पर विश्वास करो। अपने मन से positive बात करो। खुद को खुश करो। यानि फिल्म देखो, घूमने जाओ, जो इन्सान अच्छा लगे उसके पास जाओ। खुद को खुश करो।

    ऐसा करने से आप का चित्त प्रसन्न होगा। और आप के मुश्किल से मुश्किल काम ऐसे चुटकियों में सफल होने लगेंगे। पोस्ट अच्छी लगे तो पोस्ट Like करो, पोस्ट Share करो। और हमें Subscribe करना भूलना नहीं। धन्यवाद।

    15 सित॰ 2017

    नरेंद्र मोदी का संघर्षों भर जीवन।

    By: Successlocator On: सितंबर 15, 2017
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  • दोस्तों अगर मैं आपसे एक सवाल पूछूं क्या नरेन्द्र मोदी जी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं तो आपका जवाब क्या होगा ?



    यकीन मानिए 80% लोग यह चाहते हैं कि आगे होने वाले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ही प्रधानमंत्री बने। और आप अगर उनके बारे में थोड़ा बहुत भी जानते हैं, उन्होंने अपने पूरे जीवन में क्या-क्या किया और कैसे वो आगे बढ़े तो आपको उनकी बातें सुनकर गर्व होगा।

    आखिर कैसे वे एक चाय बेचने वाले लड़के से गुजरात के मुख्यमंत्री बने और कैसे वहां की जनता ने उन्हें चार बार लगातार वहां का मुख्यमंत्री चुना। देश में या यूँ कहें पूरे विश्व में ऐसी बहुत ही कम जगह है जहाँ पर एक ही व्यक्ति को लगातार चुनाव में जीतता है।

    नरेन्द्र मोदी जी के पिता दामोदरदास मूलचंद मोदी एक बहुत गरीब परिवार से थे। दामोदर दास जी की चाय की दुकान थी जिसमें नरेन्द्र मोदी बचपन में उनकी मदद किया करते थे। और बाद में वो दुकान नरेंद्र मोदी जी अपने बड़े भाई के साथ चलाने लगे। मोदी जी बचपन में नाटक और राजनीती में बहुत दिलचस्प थे।
    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब सेना के जवान स्टेशन पर आते थे तो नरेन्द्र मोदी जी उनकी सेवा करते थे। उनको सहारा देते थे उनका उपचार करते थे और बहुत सी चीजें उनको सही करने के लिए करते थे। मोदी जी ने अपनी पढ़ाई गुजरात यूनिवर्सिटी से पूरी की और उसके आगे की पढ़ाई डेल्ही वर्सिटी से पूरी की। नरेन्द्र मोदी जी गुजरात से लगातार चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। और दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल सीटों में से दो सौ बहत्तर सीटें जीतकर इतिहास रच दिया।और उसके बाद वे भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री बने। मोदी जी दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं की लिस्ट में नौवें स्थान पर हैं और यह स्थान उनको विश्व प्रसिद्ध फोर्ब्स पत्रिका में दिया गया है।

    8 सित॰ 2017

    गुरु दक्षिणा।

    By: Successlocator On: सितंबर 08, 2017
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  • एक पहुंचे हुए गुरु अपने चार शिष्यों के साथ रहते थे। शिष्यों को तरह तरह के ज्ञान बताते। एक दिन जब गुरु ने शिष्यों को कहा कि उनकी शिक्षा पूरी हो चुकी है तो वे गुरूजी से गुरुदक्षिणा मांगने का अनुरोध करने लगे।

    पहले तो गुरु ने उनको मना किया कि उन्हें गुरुदक्षिणा देने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन शिष्यों के बार बार अनुरोध करने पर गुरु ने कहा..

    "ठीक है अगर तुम मुझे देना ही चाहते हो तो मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए बाद एक टोकरा सुखी पत्तियां मेरे लिए ला दो।"

    शिष्यों ने सोचा कि गुरूजी को इतनी छोटी सी चीज चाहिए जिसको तो वे चुटकियों में ला सकते हैं। उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी गुरू से आज्ञा ली और चल पड़े घने जंगल में सुखी पत्तियां ढूंढने।।

    जंगल में जाकर उन्होंने देखा कि वहां तो पेड़ों पर ही पत्तियां थी। कुछेक पत्तियां जमीन पर बिखरी पड़ी थी लेकिन वो तो बहुत थोड़ी सी थी। उनसे एक टोकरी तो क्या एक मुट्ठी भी न भरे। चारों शिष्य बहुत ही दुखी हो गए। सोचने लगे कि जंगल में तो इतनी सारी पत्तियां होनी चाहिए कि घर भर जाए लेकिन यहां तो एक टोकरी भरने को भी पत्तियां नहीं। वहां पास में एक लकड़हारा लकड़ियाँ काट रहा था। शिष्यों के पूछने पर उसने बताया कि सुखी पत्तियां सुबह ही समेट कर अपने घर ले जाकर आग जलाने में उपयोग में ले ली। उसने उन्हें बताया कि आगे एक गाँव है जहां एक व्यापारी सुखी पत्तियां कोई दे सकता है।

    चारों गाँव में गये। व्यापारी ने उन्हें बताया कि उसने तो पत्तियों के पत्तल बना बना कर बेच दिए। अब उसके पास एक भी सुखी पत्ती नहीं थी। चारों अत्यन्त मायूस हो गए। व्यापारी ने उन्हें एक औरत का पता बताया जिसके पास सुखी पत्तियां होने की संभावना थी। पर औरत के पास जाने पर पता चला कि औरत तरह तरह की पत्तियों से दवाइयां बनाती थी और उसके पास आज कोई सुखी पत्ती नहीं थी।

    दुखी होकर चारों गुरु के पास लौटे और सारा हाल कह दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें अंदाजा नहीं था कि सुखी पत्तियों का भी इतना प्रयोग किया जाता।



    गुरु ने हंसते हुए कहा,"सुनो तुम सब, यह जो ज्ञान तुम्हें आज मिला है यही मेरी गुरुदक्षिणा है। कभी किसी चीज को छोटा मत समझो। हर छोटी से छोटी चीज बड़े से बड़ा काम कर सकती है। जो काम एक सुई कर सकती है वह काम क्या एक तलवार क्र सकती है भला। तुम्हें यही समझाने के लिए मैने तुम्हें पत्तियां लाने को कहा था। और चूँकि तुम समझ गए हो तुम्हें ज्ञान मिल गया है तो मुझे भी अपनी गुरुदक्षिणा मिल गयी है।"

    7 सित॰ 2017

    एक कहानी जो बहुत कुछ सिखा देगी।

    By: Successlocator On: सितंबर 07, 2017
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  • वन में एक बड़ा और मजबूत पेड़ था। वह लंबा और मजबूत था वृक्ष के पास एक छोटा सा पेड़ भी था।

    मजबूत पेड़ ने कहा की मैं बहुत सुंदर और मजबूत हूं। कोई मुझे हरा नहीं सकता। यह सुनकर, छोटे पेड़ ने उत्तर दिया, प्रिय मित्र, बहुत गर्व हानिकारक है। यहां तक कि मजबूत भी एक दिन गिर जायेगा।
    मजबूत पेड़ ने उसके शब्दों को नजरअंदाज कर दिया। वह खुद की प्रशंसा जारी राखी। एक मजबूत हवा चली तब भी बड़ा पेड़ दृढ़ता से खड़ा था यहां तक कि जब भी बारिश हुई, तो पेड़ अपने पत्ते फैलाने से मजबूत था। इन दिनों के दौरान, छोटा पेड़ जुक गया। बड़े पेड़ ने उसका मज़ाक उड़ाया

    एक दिन, वन में एक भारी तूफान आया तब छोटा पेड़ हमेशा की तरह जुक गया था लेकिन बड़ा और मजबूत पेड़ ऐसा नहीं कर सका

    उसने अपनी पूरी कोशिश की कि वह सीधे खड़े रहें, लेकिन अंत में, वह गिर गया। यह गर्व वृक्ष का अंत था।

    जब सब कुछ फिर से शांत हो गया था, छोटा पेड़ सीधे खड़ा था।

    1 सित॰ 2017

    कहानी राजा भोज औऱ महात्मा की।

    By: Successlocator On: सितंबर 01, 2017
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  • एक बार की बात है, राजा भोज दिन भर की व्यस्तता के बाद गहरी नींद में सोए हुए थे। स्वप्न में उन्हें एक दिव्य पुरुष के दर्शन हुए। उस दिव्य पुरुष के चारों ओर उजला आभा मंडल था। भोज ने बड़ी विनम्रता से उनका परिचय पूछा। मंद-मंद मुस्काते हुए वह बोले, ‘‘मैं सत्य हूं। मैं तुम्हें तथाकथित उपलब्धियों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूं। चलो, मेरे साथ।’’
    राजा उत्सुकता और खुशी से उनके साथ चल दिए। भोज खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा समझते थे। उन्होंने अपने राज्य में कई मंदिर, धर्मशालाएं, नहरें और कुएं आदि बनवाए थे। उनके मन में इन कामों के लिए गर्व भी था। दिव्य पुरुष भोज को उनके ही एक शानदार बगीचे में ले गए और बोले, ‘‘तुम्हें इस बगीचे का बड़ा अभिमान है न।’’
    फिर उन्होंने एक पेड़ छुआ और देखते ही देखते वह ठूंठ हो गया। एक-एक करके सभी सुंदर फूलों से लदे वृक्षों को छूते गए और वे सब ठूंठ होते चले गए। इसके बाद वह उन्हें भोज के एक स्वर्ण जडि़त मंदिर के पास ले गए। भोज को वह मंदिर अतिप्रिय था। दिव्य पुरुष ने जैसे ही उसे छुआ, वह लोहे की तरह काला हो गया और खंडहर की तरह गिरता चला गया। यह देख राजा के तो होश उड़ गए। वे दोनों उन सभी स्थानों पर गए जिन्हें राजा भोज ने चाव से बनवाया था। दिव्य पुरुष बोले, राजन, भ्रम में मत पड़ो। भौतिक वस्तुओं के आधार पर महानता नहीं आंकी जाती। एक गरीब आदमी द्वारा पिलाए गए एक लोटे जल की कीमत, उसका पुण्य, किसी यशलोलुप धनी की करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से कहीं अधिक है।’’
    इतना कहकर वह अंतर ध्यान हो गए। राजा भोज ने स्वप्न पर गंभीरता से विचार किया और फिर ऐसे कामों में लग गए जिन्हें करते हुए उन्हें यश पाने की लालसा बिल्कुल नहीं रही।

    30 अग॰ 2017

    मेजर ध्यानचंद

    By: Successlocator On: अगस्त 30, 2017
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  • हम दिन भर कई सारे मुद्दों से घिरे रहते हैं और उसमें उन चीजों को भूल जाते हैं जो हमारे वर्तमान से, हमारे अस्तित्व से जुड़ा है.आज ध्यानचंद का बर्थ डे है मगर वो राम रहीम सिंह, बाबा रामपाल, आसाराम बापू, चीन और डोकलाम के बीच कहीं दब से गए हैं.

    चाहे मेन स्ट्रीम मीडिया हो या फिर सोशल मीडिया बीते कई दिनों से बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह, बाबा रामपाल, आसाराम बापू समेत चीन और डोकलाम चर्चा में है. कहा जा सकता है कि इन चीजों और बातों को छोड़ शायद हमारे पास कोई मुद्दा ही नहीं बचा है. या ऐसा भी हो सकता है कि सोशल मीडिया के इस टॉयलेट युग में हम इन मुद्दों पर बात कर पब्लिसिटी पाने के भूखे हैं. हो कुछ भी सकता है, संभव सब है.
    व्यक्तिगत रूप से मेरा इन मुद्दों से दिल भर चुका है, और शायद अब तक आप भी इन खबरों और बातों से उकता गए हों. तो चलिए आज कुछ ऐसी बात की जाए जिसको पढ़कर या जिसपर चर्चा करते हुए हमें और आपको स्वयं पर गर्व की अनुभूति हो. जी हां, बिल्कुल सही सुन रहे हैं आप. जिस बात के लिए आपको अपने भारतीय होने पर गर्व करना चाहिए वो ये है कि, आज 'हॉकी के जादूगर' काहे जाने वाले मेजर ध्यान चंद का बर्थ डे, यानी जन्मदिन है.

    आज का दिन हर भारतीय के लिए बेहद खास है जिसपर उसे गर्व करना चाहिए
    क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस जैसे खेलों के बीच भले ही आज हमारी हॉकी विश्व मानचित्र पर उतना प्रभाव न रखती हो मगर इसे जब भी और जितना भी जाना गया है वो मेजर ध्यान चंद के जरिये ही जाना गया है. कहा जा सकता है कि वर्तमान परिपेक्ष में मेजर ध्यानचंद और हॉकी दोनों ही एक दूसरे के पर्याय हैं.
    हमें मेजर ध्यानचंद और हॉकी दोनों पर कोई लंबा चौड़ा और दो या 3 हजार शब्दों का आर्टिकल नहीं लिखना है. न ही हमें इस खानापूर्ति भर के लिए लिखना है क्योंकि आज उनका जन्मदिन है. आज ध्यानचंद को याद करने का या उन पर बात करने का उद्देश्य, केवल इतना है कि उनपर बात होनी चाहिए और उनके बारे में लोगों को ज्यादा से ज्यादा जानना चाहिए. चाहे आप सहमत हों या न हों मगर इतना समझ लीजिये कि मेजर ध्यानचंद किसी एक दिन के मोहताज नहीं हैं और न ही इन्हें एक दिन के घेरे में कैद किया जा सकता है.
    गौरतलब है कि 29 अगस्त, 1905 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्में मेजर ध्यानचंद का जन्मदिन भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. 16 साल की उम्र में सेना में सर्विस देकर मेजर की रैंक पर रिटायर होने वाले ध्यान चंद ने 400 गोल किये थे. ध्यानचंद के बारे में ये भी कहा जाता है कि इन्होंने 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक्स में 14 गोल किए और सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बने.
    ध्यान चंद का हॉकी स्टिक पर कमांड कैसा था, इसे आप एक घटना से समझ सकते हैं. कहा जाता है कि एक बार नीदरलैंड्स के अधिकारियों ने ध्यानचंद का हॉकी स्टिक सिर्फ इसलिए तोड़ दी क्योंकि उनको शक था कि जरूर ध्यानचंद हॉकी स्टिक में चुंबक जैसी कोई चीज लगाकर आते हैं जिससे जब एक बार गेंद इनके कब्जे में आती है तो उसे कोई छुड़ा नहीं पाता.

    आज ध्यानचंद का जन्मदिन है मगर ऐसे कई कारण हैं जिसके चलते हमें उन्हें याद करना चाहिए
    1956 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित ध्यानचंद ने तब भारत का नाम विश्व पटल पर रौशन किया था जब उन्होंने तीन ओलिंपिक खेलों 1928, 1932 और 1936 में भारत को गोल्ड मेडल दिलवाया था. ध्यानचंद के बारे में ये तक मशहूर है कि जर्मनी का तानाशाह हिटलर तक इनके खेल से प्रभावित था और चाहता था कि ध्यानचंद जर्मनी के लिए खेलें.
    उपरोक्त सारो बातों के बाद मुझे ध्यानचंद पर गर्व है और मुझे महसूस हो रहा है कि इन जानकारियों के बाद आपको भी ध्यानचंद के अलावा अपने भारतीय होने पर गर्व हो रहा होगा. अंत में इतना ही कि ध्यानचंद या इनसे मिलती जुलती शख्सियतें ऐसी हैं जिन्हें हमें न सिर्फ हर रोज बल्कि हर पल याद करना चाहिए. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ध्यानचंद हमारे इतिहास से जुड़े हैं और अगर हम अपना इतिहास भूलते हैं तो न सिर्फ हम अपना वर्तमान खराब कर रहे रहे हैं बल्कि हमारा भविष्य भी गर्त के अंधेरों में डूब जाएगा.

    29 अग॰ 2017

    विवेकानंद के जीवन के प्रेरक प्रसंग

    By: Secret On: अगस्त 29, 2017
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  • महापुरुष सिर्फ विचारों से ही नहीं, कर्मों से भी अनुकरणीय होते हैं. महात्मा गांधी ने कहा था मेरा जीवन ही संदेश है. यह बात विवेकानंद ने कही तो नहीं, लेकिन उनका जीवन निश्चित तौर पर अनुकरणीय संदेश के तौर पर हमारे सामने उपस्थित है. विवेकानंद के जीवन के कई ऐसे प्रसंग विभिन्न किताबों में मिलते हैं, जिनसे काफी कुछ सीखा जा सकता है, नयी दृष्टि प्राप्त की जा सकती है. इन प्रसंगों से गुजरना जीवन को लेकर एक सकारात्मक सोच विकसित करने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है. हम यहां विवेकानंद के जीवन से जुड़े ऐसे ही कुछ प्रसंगों का संकलन इस उम्मीद से कर रहे हैं कि ये युवाओं समेत व्यापक समाज को नयी प्रेरणा देने का काम करेंगे.
    * लक्ष्य पर ध्यान लगाओ
    स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे. एक जगह से गुजरते हुए उन्होंने पुल पर खड़े कुछ लड़कों को नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बंदूक से निशाना लगाते देखा. किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था. तब उन्होंने एक लड़के से बंदूक ली और खुद निशाना लगाने लगे.

    उन्होंने पहला निशाना लगाया और वह बिलकुल सही लगा. फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाये और सभी बिलकुल सटीक लगे. ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पूछा, भला आप ये कैसे कर लेते हैं? स्वामी जी बोले, तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ. अगर तुम निशाना लगा रहे हो, तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए. तब तुम कभी चूकोगे नहीं. अगर तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो, तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो. मेरे देश में बच्चों को यही करना सिखाया जाता है.

    * संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है

    एक बार स्वामी विवेकानंद विदेश यात्रा पर गये थे. उनका भगवा वस्त्र और आकर्षक पगड़ी देख कर लोग अचंभित रह गये और वे यह पूछे बिना नहीं रह सके, आपका बाकी सामान कहां है?

    स्वामी जी बोले, मेरे पास बस यही सामान है.

    तो कुछ लोगों ने व्यंग्य किया, अरे! यह कैसी संस्कृति है आपकी? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है. कोट-पतलून जैसा कुछ भी पहनावा नहीं है?

    इस पर स्वामी विवेकानंद जी मुस्कुराये और बोले, हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से भिन्न है. आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं. जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है. संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है.

    * मृत्यु के समक्ष

    एक अंगरेज मित्र तथा कु. मूलर के साथ स्वामीजी मैदान में टहल रहे थे. उसी समय एक पागल सांड तेजी से उनकी ओर बढ़ने लगा. अंगरेज सज्जन भाग कर पहाड़ी के दूसरी छोर पर जा खड़े हुए. कु. मूलर भी जितना हो सका दौड़ी और घबराकर गिर पड़ीं. स्वामीजी ने उन्हें सहायता पहुंचाने का कोई और उपाय न देख खुद सांड के सामने खड़े हो गये और सोचने लगे, ह्यचलो, अंत आ ही पहुंचा.

    बाद में उन्होंने बताया था कि उस समय उनका मन हिसाब करने में लगा हुआ था कि सांड उन्हें कितनी दूर फेंकेगा. लेकिन कुछ देर बाद वह ठहर गया और पीछे हटने लगा. अपने कायरतापूर्ण पलायन पर वे अंगरेज बड़े लज्जित हुए. कु. मूलर ने पूछा कि वे ऐसी खतरनाक स्थिति से सामना करने का साहस कैसे जुटा सके? स्वामीजी ने पत्थर के दो टुकड़े उठाकर उन्हें आपस में टकराते हुए कहा, खतरे और मृत्यु के समक्ष मैं स्वयं को चकमक पत्थर के समान सबल महसूस करता हूं, क्योंकि मैंने ईश्वर के चरण स्पर्श किये हैं.

    * देने का आनंद, पाने के आनंद से बड़ा

    भ्रमण एवं भाषणों से थके हुए स्वामी विवेकानंद अपने निवास स्थान पर लौटे. उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे. वे अपने हाथों से भोजन बनाते थे. एक दिन वे भोजन की तैयारी कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास आकर खड़े हो गये.

    उनके पास सामान्यतया बच्चों का आना-जाना लगा ही रहता था. बच्चे भूखे थे. स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक कर बच्चों में बांट दीं. महिला वहीं बैठी सब कुछ देख रही थी. यह सब देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ.  आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने स्वामीजी से पूछ ही लिया, आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डालीं, अब आप क्या खायेंगे?

    स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गयी. उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, मां, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करनेवाली वस्तु है. इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही. देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है.

    * सच बोलने की हिम्मत

    स्वामी विवेकानंद एक दिन कक्षा में मित्रों को कहानी सुना रहे थे. सभी इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मास्टरजी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया. मास्टरजी को कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी. कौन बात कर रहा है? उन्होंने पूछा. सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया. मास्टरजी ने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबंधित एक प्रश्न पूछने लगे. जब कोई उत्तर न दे सका, तो मास्टरजी ने स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया.

    उन्होंने उत्तर दे दिया. मास्टरजी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बातचीत में लगे थे. उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी. सभी छात्र बेंच पर खड़े होने लगे, स्वामी जी ने भी यही किया. तब मास्टर जी स्वामी जी से बोले, तुम बैठ जाओ. नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि मैं ही इन छात्रों से बात कर रहा था. स्वामी जी ने कहा. सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए.

    * मन की शक्ति अभ्यास से आती है

    यह बात उन दिनों की है जब स्वामी विवेकानंद देश भ्रमण में थे. साथ में उनके एक गुरु भाई भी थे. स्वाध्याय, सत्संग एवं कठोर तप का अविराम सिलसिला चल रहा था. जहां कहीं अच्छे ग्रंथ मिलते, वे उनको पढ़ना नहीं भूलते थे. किसी नयी जगह जाने पर उनकी सब से पहली तलाश किसी अच्छे पुस्तकालय की रहती.

    एक जगह एक पुस्तकालय ने उन्हें बहुत आकर्षित किया. उन्होंने सोचा, क्यों न यहां थोड़े दिनों तक डेरा जमाया जाये. उनके गुरुभाई उन्हें पुस्तकालय से संस्कृत और अंगरेजी की नयी-नयी किताबें लाकर देते थे. स्वामीजी उन्हें पढ़कर अगले दिन वापस कर देते.

    रोज नयी किताबें वह भी पर्याप्त पृष्ठों वाली इस तरह से देते एवं वापस लेते हुए उस पुस्तकालय का अधीक्षक बड़ा हैरान हो गया. उसने स्वामी जी के गुरु भाई से कहा, क्या आप इतनी सारी नयी-नयी किताबें केवल देखने के लिए ले जाते हैं? यदि इन्हें देखना ही है, तो मैं यों ही यहां पर दिखा देता हूं. रोज इतना वजन उठाने की क्या जरूरत है.

    लाइब्रेरियन की इस बात पर स्वामी जी के गुरु भाई ने गंभीरतापूर्वक कहा, जैसा आप समझ रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं है. हमारे गुरु भाई इन सब पुस्तकों को पूरी गंभीरता से पढ़ते हैं, फिर वापस करते हैं.

    इस उत्तर से आश्चर्यचकित होते हुए लाइब्रेरियन ने कहा, यदि ऐसा है तो मैं उनसे जरूर मिलना चाहूंगा. अगले दिन स्वामी जी उससे मिले और कहा, महाशय, आप हैरान न हों. मैंने न केवल उन किताबों को पढ़ा है, बल्कि उनको याद भी कर लिया है. इतना कहते हुए उन्होंने वापस की गयी कुछ किताबें उसे थमायी और उनके कई महत्वपूर्ण अंशों को शब्दश: सुना दिया.

    लाइब्रेरियन चकित रह गया. उसने उनकी याददाश्त का रहस्य पूछा. स्वामी जी बोले, अगर पूरी तरह एकाग्र होकर पढ़ा जाए, तो चीजें दिमाग में अंकित हो जाती हैं. पर इसके लिए आवश्यक है कि मन की धारणशक्ति अधिक से अधिक हो और वह शक्ति अभ्यास से आती है.

    * खतरे के आगे डरो मत

    स्वामी विवेकानंद बचपन से ही निडर थे, जब वह आठ साल के थे तभी से एक मित्र के यहां खेलने जाया करते थे. उसके घर में एक चंपक पेड़ था. एक दिन वह उस पेड़ को पकड़ कर झूल रहे थे. मित्र के दादाजी पहुंचे. उन्हें डर था कि कहीं नरेंद्र गिर न जाएं, इसलिए उन्होंने समझाते हुआ कहा, नरेंद्र, तुम इस पेड़ से दूर रहो, क्योंकि इस पेड़ पर एक दैत्य रहता है.

    नरेंद्र को अचरज हुआ. उसने दादाजी से दैत्य के बारे में और भी कुछ बताने का आग्रह किया. दादाजी बोले, वह पेड़ पर चढ़ने वालों  की गर्दन तोड़ देता है. नरेंद्र बिना कुछ कहे आगे बढ़ गये. दादाजी भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गये. उन्हें लगा कि बच्चा डर गया है. पर जैसे ही वे कुछ आगे बढ़े नरेंद्र पुन: पेड़ पर चढ़ गये और डाल पर झूलने लगे. मित्र जोर से चीखा, तुमने दादाजी की बात नहीं सुनी. नरेंद्र जोर से हंसे और बोले, मित्र डरो मत! तुम भी कितने भोले हो! सिर्फ इसलिए कि किसी ने तुमसे कुछ कहा है उस पर यकीन मत करो. खुद सोचो अगर यह बात सच होती तो मेरी गर्दन कब की टूट चुकी होती.

    पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बारे में कुछ बातें

    By: Successlocator On: अगस्त 29, 2017
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  • भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर, 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गाँव में हुआ था, तमाम अभावों के बावजूद उन्होंने शिक्षा ली, कानून के क्षेत्र में डाक्टरेट की उपाधि भी हासिल की. राजेंद्र प्रसाद ने वकालत करने के साथ ही भारत की आजादी के लिए भी काफी संघर्ष किया.


    1. 1905 में जब गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी ज्वाइन करने को कहा तो वे असमंजस की स्थिति में थे क्योंकि उन्हें उनका परिवार भी देखना था और पढ़ाई भी करनी थी. इस वाकये के बारे में राजेंद्र प्रसाद ने बाद में कहा कि उनके जीवन का यह सबसे कठिन वक्त था. इसी से उनकी पढ़ाई भी खराब हो गई क्योंकि उनका सारा ध्यान देश की ओर था. उन्होंने किसी तरह से लॉ की परीक्षा पास की.

    2. राजेंद्र प्रसाद हमेशा एक अच्छे स्टूडेंट के रूप में जाने जाते थे. उन्हें हर महीने 30 रुपये की स्कॉलरशिप पढ़ाई करने के लिए मिलती थी. उनकी एग्जाम शीट को देखकर एक एग्जामिनर ने कहा था कि 'द एग्जामिनी इज बेटर देन द एग्जामिनर'.

    3. राजेंद्र प्रसाद दो साप्ताहिक मैगजीन भी निकालते थे. हिंदी में निकलने वाली मैगजीन का नाम 'देश' और अंग्रेजी में निकलने वाली मैगजीन का नाम 'सर्चलाइट' था.

    4. प्रसाद ने  1906 में बिहारी स्टूडेंट्स कॉन्फ्रेंस का आयोजन करवाया, इस तरह का आयोजन पूरे भारत में पहली बार हो रहा था. इस आयोजन ने बिहार के दो बड़े नेताओं अनुग्रह नारायण और कृष्ण सिन्हा को जन्म दिया. प्रसाद 1913 में बिहार छात्र सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए.

    5. जब 1930 में महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह आंदोलन चलाया तो राजेंद्र प्रसाद को इसके लिए बिहार का मुख्य नेता बनाया गया. प्रसाद ने फंड बढ़ाने के लिए नमक बेचने का काम भी किया.

    6. भारत रत्न अवार्ड की शुरुआत राजेंद्र प्रसाद के द्वारा 2 जनवरी 1954 को हुई थी. उस समय तक केवल जीवित व्यक्ति को ही भारत रत्न दिया जाता था. बाद में इसे बदल दिया गया. 1962 में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को देश का सर्वश्रेष्ण सम्मान भारत रत्न दिया गया.

    7. प्रसाद ने सुभाष चंद्र बोस और गांधी के बीच मतभेदों को दूर करने का हर संभव प्रयास किया ताकि स्वतंत्रता आंदोलन प्रभावित न हो सके.

    8. 1934 में बिहार में आए भूकंप और बाढ़ के दौरान उन्होंने रिलीफ फंड जमा करने के लिए काफी मेहनत की. उन्होंने फंड के लिए 38 लाख रुपये जुटाए जो कि वायसराय के फंड से तीन गुना ज्यादा था.

    9. चंपारण आंदोलन के समय जब प्रसाद ने देखा कि महात्मा गांधी जैसा व्यक्ति लोगों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता है तो वे भी आंदोलन में शामिल हो गए. उसी आंदोलन के दौरान जब महात्मा गांधी को ठहरने के लिए जगह नहीं मिल रही था तो वे राजेंद्र प्रसाद के घर पर रुके थे.

    10. राजेंद्र प्रसाद के काम और व्यवहार को देखते हुए भारत के महान कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने राजेंद्र प्रसाद को ख़त में लिखा था कि मैं तुम पर भरोसा करता हूं कि तुम पीड़ित लोगों की मदद करोगे और खराब वक्त में भी लोगों के बीच एकता और प्यार को बनाए रखोगे.

    13 जन॰ 2017

    Andrew Carnegie की कहानी जिसने सफलता की परिभाशा ही बदल दी।

    By: Successlocator On: जनवरी 13, 2017
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  • स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं –
    1 . ये वो हैं जो समय के साथ खुद को नहीं बदलते और पिछड़ जाते हैं ,
    2. ये वो लोग हैं वो समय के साथ खुद को बदल लेते हैं और आगे बड़ जाते हैं
    3. ये वो लोग हैं जो समय के अनुसार नहीं बदलते बल्कि समय को ही अपने अनुसार बदल देते हैं और इन्हीं को युगपुरुष कहा जाता हैं जो सदियों में एक बार जन्म लेते हैं ।

    Andrew Carnegie ये नाम है उस शख्स का जिसे स्टील टाइकून(स्टील किंग) कहा जाता है । जो अपने धैर्य और परिश्रम की वजह से दुनियां के सबसे अमीर आदमी बने । इनका जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था जिनके पास दो वक्त का खाना जुटाने के लिए भी पैसे नहीं थे और केवल एक कमरे का घर था । ये स्कॉटलैंड के रहने वाले थे लेकिन गरीबी और भुखमरी की वजह से ये लोग काम की तलाश में अमेरिका आ गए । घर की दरिद्रता की वजह से ऐन्ड्रू की पढ़ाई भी नहीं हो पायी और 13 साल की छोटी सी उम्र में घर घर का भार सँभालने की जिम्मेदारी कन्धों पे आ गयी ।
    13 साल के ऐन्ड्रू ने एक कपड़े बनाने की फैक्ट्री में छोटी सी नौकरी कर ली जहाँ उसे 12 घंटे और सातों दिन कठिन परिश्रम करना पढता , लेकिन जिस इंसान में लगन होती है वही कोयले से हीरा बनाने का माद्दा रखते हैं । ऐन्ड्रू काम से समय निकाल कर सफल लोगों की कहानियां पढता था उनसे प्रेरणा लेता था । धीरे -धीरे समय बीतता गया , ऐन्ड्रू ने कुछ दिन बाद एक पोस्टमैन की नौकरी भी की । शहर में बड़ी लाइब्रेरी थी जहाँ किताबों का विशाल संकलन था । ऐन्ड्रू वक्त निकाल कर लाइब्रेरी में पढता रहता था । यहाँ उसने कुछ इंटस्ट्री और बिज़निस के बारे में सीखा , नौकरी करते हुए कुछ पैसे इकट्ठे किये और धीरे धीरे स्टील बनाने वाली कम्पनीयों में इन्वेस्ट करने लगे जिससे उन्हें अच्छी इनकम हो जाती थी इसी तरह समय का चक्र चलता गया और फिर ऐन्ड्रू ने एक दिन अपनी खुद की कंपनी बनाने की सोची ।

    यही सोचकर Carnegie Steel Corporation नाम की एक कंपनी की स्थापना की शुरुआत में कंपनी औसत रही लेकिन ये ऐन्ड्रू कार्नेगी की मेहनत और लगन का ही नतीजा था की कुछ ही सालो में ऐन्ड्रू स्टील किंग बन गए और बहुत जल्द उन्हें Builders of America का अवार्ड मिला । एक समय था जब ऐन्ड्रू कार्नेगी की अकेली कंपनी पूरे ब्रिटेन से ज्यादा स्टील उत्पादन करती थी । और इसी लगन ने एक दिन ऐन्ड्रू को बना दिया “दुनिया का सबसे अमीर इंसान “, 1889 में ऐन्ड्रू कार्नेगी को दुनिया का सबसे अमीर इंसान घोषित किया गया ।
    अपनी लगन और परिश्रम से ऐन्ड्रू ने इतिहास को बदल कर रख दिया जिस व्यक्ति का परिवार एक समय भुखमरी से जूझा हो उसके लिए दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनना एक मिशाल पेश करने से काम नहीं हैं ।

    तो मित्रों दृंढ निश्चय और मेहनत से पहाड़ो का भी सीना चीरा जा सकता है बस जरुरत है अपने आत्मविश्वाश को जगाने की

    12 जन॰ 2017

    अगर सफल होना है तो लोगों की परवाह करना छोड़ दो|

    By: Successlocator On: जनवरी 12, 2017
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  • दोस्तों असफलता अपनी मंजिल को पाने का एक महत्वपूर्ण पहलू है. अगर हमें सफल होना है तो अपनी असफलताओं का डट कर मुकाबला करना होगा. आप दुनिया के कितने भी अच्छे से अच्छे काम की शुरुआत करने की कोशिश कीजिये, आपको कोई न कोई तो उसके बारे में नकारात्मक विचार देने वाला मिल ही जायेगा. अपनी जिन्दगी के सफ़र में हमारा कई बार असफलताओं से सामना हो सकता है. इस दौरान हम यह सोच कर कि लोग हमारे बारे में क्या कहेंगे, हमारी इज्जत का क्या होगा, रिश्तेदारों को हम क्या जबाब देंगे, हम मानसिक तनाव तो झेलते ही है साथ ही साथ हम अपने जीवन का भी नाश कर लेते हैं.

    अगर आगे बढ़ना है तो ये मत सोचो की लोग क्या कहेंगे? सीधी सी बात है दोस्तों अगर सफल होना है तो लोगो की परवाह करना छोड़ दो. जो आपको अच्छा और सच्चा लगे बस वही काम करते रहो. मैं यह नहीं कहता कि हमें किसी की राय नहीं लेनी चाहिए या फिर किसी का सुझाव नहीं मानना चाहिए, बल्कि हमें हर एक व्यक्ति के विचार सुनने चाहिए और जो विचार हमें अच्छे और सच्चे लगे उन्हें अपने जीवन में, अपने काम में अपना लेने चाहिए. लेकिन दोस्तों बहुत बार देखा जाता है कि हम दूसरों की बातों से  निरासा के जाल में घिर जाते हैं.
    इस बात को अच्छे से समझने के लिए ये कहानी जरुर पढ़ें और उसके बाद मैं अपनी कुछ personal experience share करने की कोशिश करूँगा. उम्मीद है आप लोगों को मेरी यह कोशिश ज़रूर पसंद आएगी.

    एक बार रामलाल नाम का व्यक्ति अपने बेटे को गधे पर बैठा कर कहीं जा रहा था. कुछ दूर चलने पर उन्हें दो लोगो को आपस में बात करते हुए दिखाई दिए वो कह रहे थे “देखो भाई आज कल क्या जमाना आ गया है. बेटा मजे से गधे पर सवारी कर रहा है और बाप पैदल चल रहा है.”

    दुसरे ने कहा “हां भाई अब बच्चों में पहले जैसे संस्कार कहाँ.”

    यह सब सुन कर रामलाल ने तुरंत अपने बेटे को गधे से नीचे उतार दिया और खुद उस गधे पर बैठ गये और चलने लगे. कुछ दूर चलने के बाद रामलाल को कुछ महिलाएं यह कहते हुए सुनाई दी कि “अरे! ये देखो कितना बुरा बाप, खुद तो गधे पर बैठा है और बेचारे बच्चे को पैदल चला रहा है.”


    महिलाओं की बात सुन कर रामलाल ने अपने बेटे को भी अपने साथ गधे पर बैठा लिया और आगे चलने लगे. कुछ दूर चलने पर उन्हें एक बुजुर्ग व्यक्ति मिला और रामलाल को कहने लगा “अरे मुर्ख व्यक्ति! तुम्हे शर्म नही आती है? एक बेजान प्राणी पर दोनों बाप-बेटा बैठे हो. इस बेचारे गधे पर कुछ तो दया करो.” उस बुजुर्ग की बातें सुनकर रामलाल का दिमाग खराब होने लगा. फिर उसने सोचा कि अब हम दोनों पैदल ही चलेंगे. फिर दोनों बाप और बेटा गधे के साथ पैदल ही चलने लगे. वो तीनो कुछ दूर ही चले थे कि रामलाल को कुछ लोग उन पर जोर-जोर से हँसते हुए दिखाई दिए और कह रहे थे कि “ये देखो दुनिया के सबसे बड़े मुर्ख जो इतना अच्छा गधा होते हुआ भी दोनों पैदल चल रहे है.”


    तो दोस्तों इस कहानी का एक मात्र आशय ही की आपको समझाना दुनिया की परवाह किये बिना जो आपका दिल कहे करिये ।और आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी

    "जब जब जिस पर दुनिया हसी है तब तब उसी ने इतिहास रचा है"।

    9 जन॰ 2017

    रेलवे की ग्रुप डी की परीक्षा में रहे थे नाकाम, अब आईएएस की परीक्षा में दिखाया जलवा

    By: Successlocator On: जनवरी 09, 2017
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  • चाणक्य ने लिखा है कि शिक्षा आपकी बेहतरीन दोस्त है और शिक्षा ही जवानी, सुंदरता और पैसे को हरा सकती है। बहुत पहले पढ़ा चाणक्य का यह कोड अचानक ही आईएएस परीक्षा में टॉप करने वाली इरा सिंघल के घर में याद आ गई। महज 4 फुट 5 इंच की इरा ने अपने फौलादी इरादे और शिक्षा से उन लोगों की मानसिकता को हरा दिया है, जो महिलाओं और खासतौर पर विकलांगता को कमजोरी का प्रतीक मानती हैं। हमारा समाज शिक्षा से ही बदल सकता है। पढ़ाई ही वह कुंजी है, जिससे समाजिक बदलाव के बंद और अंधेरे कमरे खोले जा सकते हैं।

    अरस्तू ने कहा था कि शिक्षा की जड़े बहुत कड़वी लगती हैं, लेकिन उसका फल बहुत मीठा होता है। आईएएस परीक्षा में कामयाब कुछ ऐसे लोगों से भी मैं मिला जो पढ़ाई में बहुत सामान्य हैं, लेकिन मेहनत और सही दिशा ने उन्हें कामयाब बना दिया। दो दोस्तों की एक ऐसी ही कहानी है जो दूर-दराज के गांव और शहरों के छात्रों में प्रेरणा भरने का काम करेगी। इनका नाम सावन कुमार और आदित्य कुमार है। दोनों दिल्ली के एक ही कमरें में रहते थे। एक ही विषय मैथिली साहित्य से तैयारी कर रहे थे। पढ़ाई में दोनों औसत दर्जे के थे। कमोबेश एक जैसे ही पारिवारिक बैकग्राउंड से भी हैं। सावन कुमार के पिता जहां कंडक्टर रह चुके हैं, वहीं आदित्य कुमार के पिता किसान हैं। लेकिन पहले बात सावन कुमार की।

    खगड़िया जिले में हाई स्कूल में 65 फीसदी और इंटरमीडिएट में पचास फीसदी नंबर से पास हुए सावन कुमार ने दिल्ली आकर पढ़ाई में मेहनत की। ध्येय आईएएस इंस्टीट्यूट के विनय सिंह से मार्गदर्शन हासिल किया और अपने दोस्त आदित्य कुमार से हौसला लेकर आईएएस परीक्षा में 285 रैंक हासिल किया।
    सावन कुमार बताते हैं कि 2010 से पहले उन्होंने रेलवे के ग्रुप डी की परीक्षा भी दी, लेकिन उसे पास नहीं कर पाए। तभी आदित्य कुमार ने दिल्ली चलने को कहा। साल 2011 में जब प्रारंभिक परीक्षा नहीं पास कर पाया तो फिर रेलवे की परीक्षा देने की सोची, लेकिन मेरे दोस्त ने हौसला बढ़ाया और आज मैं कामयाब हो गया।

    वहीं बिहार में मधेपुरा के आदित्य कुमार कहते हैं कि हमारी शैक्षिक पृष्ठिभूमि औसत रही है। वह बताते हैं कि इसी के चलते हमारे जैसे छात्रों को संयम और पेशेवर तरीके से पढ़ाई करना बहुत जरूरी है। आदित्य कुमार आईएएस की परीक्षा में दो बार अंग्रेजी के विषय में फेल हो चुके थे, लेकिन उसके बावजूद हिम्मत नहीं हारे। छोटे शहर और गांव के छात्रों की यही कठोर मानसिकता और संघर्ष उनके हौसले के परचम को हमेशा इसी तरह लहराती रहेंगी।

    1 नव॰ 2016

    आप की अदालत फेम रजत शर्मा की सफलता की कहानी Rajat Sharma Success Story in Hindi

    By: Successlocator On: नवंबर 01, 2016
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  • मित्रो हम अक्सर महापुरुषो , फ़िल्मी कलाकारो , टीवी कलाकारो ,क्रिकेटरों और नेताओं की जीवनी पढ़ते है लेकिन हमने कभी किसी न्यूज़ एंकर की जीवनी बनी हो ऐसा कभी नही सुना होगा क्योंकि न्यूज़ एंकर आते जाते रहते है लेकिन जो न्यूज़ एंकर सच्चाई के साथ अपना काम करते है वो आने वाले वालो में नही बल्कि हमेशा रहने वालो में रहते है | इन्ही न्यूज़ एंकर में रजत शर्मा एक ऐसा नाम है जिनके शो आप की अदालत को देश की सारी जनता एक साथ देखती है | आप की अदालत की माध्यम से उन्होंने कई कलाकारों ,नेताओ और जानी मानी हस्तियों से वो प्रश्न पूछे जिसे पूछने के लिए लोग इसलिए घबराते थे कि शायद ऐसा शो सफल ना हो सके लेकिन उन्होंने अपनी मुस्कुराहट के बल पर देश की जानी मानी हस्तियों से सब कुछ उगलवा दिया | आइये आपको उन्ही प्रेरणादायक रजत शर्मा की कहानी से आप लोगो को रूबरू करवाते है |
    Rajat Sharma रजत शर्मा का जन्म 18 फरवरी 1957 को दिल्ली में हुआ था | रजत जी बचपन में अपने साथ भाइयो ,  एक बहन , बीमार माँ और पिता के साथ पुरानी दिल्ली में 10×10 के एक छोटे से घर में रहते थे | उस समय उनके घर में बिजली और पानी के व्यवस्था भी नही हुआ करती थी | रजत जी पढने के लिए municipality school जाते थे | रजत जी ने बताया कि उनकी आर्थिक स्तिथि इतनी कमजोर थी कि वो पाउडर का दूध पीते थे जिसे गर्म पानी में डालकर पीते है | नहाने के लिए वो गली के नुक्कड़ पर लगे हुए एक सरकारी नल पर जाते  थे | जब घर में बिजली की व्यवस्था नही हुआ करती थी तो वो पढने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन के लैंप के नीचे बैठकर पढ़ा करते थे | उस समय में पढने की लगन बहुत कम बच्चो में होती थी और बहुत कम बच्चे ज्यादा पढने  में विश्वास रखते थे लेकिन रजत जी को कुछ कर गुजरने की चाह ने पढाई में लगाये रखा |

    बचपन में उनके जीवन में एक ऐसी घटना हुयी जिसने उनके जीवन को बदलकर रख दिया | 60 के दशक में टीवी सेट कुछ ही घरो में हुआ करते थे | ऐसा मान सकते है कि 100 घरो में एक घर में टीवी हुआ करती थे | रजत जी के पडौसी के पास टीवी हुआ करती थी जहा पर सारा मोहल्ला टीवी देखने के लिए इक्ठटा हो जाता था | उस समय दूरदर्शन पर फिल्मे दो कड़ीयो में आती थी शनिवार को पहला भाग और रविवार को दूसरा भाग आता था  | एक दिन की बात है जब वो आठ साल के थे तब मनोज कुमार की “शहीद” फिल्म का पहला भाग उन्होंने अपने पडौसी के यहा देखा और दुसरे दिन जब फिल्म का दूसरा भाग देखने गये तब उनके पडौसी ने उन्हें अंदर नही आने दिया |

    अब रजत जी रोते हुए अपने घर आये क्योंकि वो फिल्म का आधा भाग नही देख पाए थे और उनके दिमाग में फिल्म के दुसरे भाग की बाते घूम रही थी | जब वो घर लौटे तो उनके पिताजी ने उनके रोने का कारण पूछा तोरजत जी ने बताया “पिताजी मै फिल्म देखने गया , आधी फिल्म कल देख ली थी और आज जब फिल्म का बाकी आधा भाग देखने गये तो उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया “|  उस समय उनके पिताजी ने जो बात कही वो उनके दिल को छु गयी , उनके पिताजी ने कहा “बेटा , तुम किसी दुसरे को देखने के लिए तीसरे के घर में टीवी देखने जाते हो अगर दम है तो तुम कुछ ऐसा करके दिखाओ कि जिससे तुम्हे टीवी देखने की जरूरत न पड़े बल्कि टीवी पर तुम्हे लोग देखे ” |

    इसके बाद उन्होंने इस बात को अपने जीवन का उद्देश्य बना दिया और पढ़ाई में लगे रहे | उनके जीवन में पहला मौका तब आया जब उन्होंने M Com पुरी कर ली | M Com पुरी करने के बाद वो समर जॉब की तलाश में घूम रहे थे तभी उनकी मुलाकात जनार्धन ठाकुर से हुयी जिन्होंने उस दौरान आनन्दबाजार पत्रिका छोडी ही थी | आनदं बाजार पत्रिका को आप अच्छी तरह जानते होंगे जो मीडिया में आज बहुत बड़ी कंपनी बनकर उभरा है जिसे हम ABP के नाम से जानते है जिनका न्यूज़ चैनल वर्तमान में चल रहा है |

    जनार्धन ठाकुर उस समय एक नये सिंडिकेटेड कॉलम को शुरू करने की तैयारी कर रहे थे | उन्होंने रजत जी को Researcher के रूप में काम पर रख लिया | करीब तीन महीने तक उन्होंने अपनी गर्मियों की छुट्टियों में उनके साथ काम किया | 1982 में जब एक बार जब उन्होंने अपनी रिसर्च का इस्तेमाल करने की आज्ञा माँगी तब उन्होंने Onlooker magazine में अपनी पहली कहानी लिखी थी | जिसके लिए उनको 300 रूपये मिले थे जो उस समय के लिए बहुत मायने रखते थे | उस समय वो एक जगह जॉब भी कर रहे थे और उनको 400 रूपये महीना मिलता था | जब उनको एक कहानी के ही 300 रूपये मिले तो उनका रुझान मैगज़ीन में काम करने की तरफ चला गया |
    इसके बाद रजत जी ने Onlooker magazine में trainee reporter के रूप में काम करना शुरू कर दिया | 1984 में उनको ब्यूरो का प्रमुख बना दिया गया और उसके बाद उनको 1985 में एडिटर बना दिया गया | इसके बाद रजत जी को मुंबई बुलाया गया जिस समय उनके पास journalism में केवल तीन साल का अनुभव था | जब वहा पर दिग्गज अफसरों ने 28 साल के रजत शर्मा को एडिटर के रूप में देखा तो लोगो ने उन्हें अपनाने से मना कर दियालेकिन बाद में उनके काम को देखकर वो उनसे खुश हुए | उन्होंने उस समय एक दुसरी पत्रिका के साथ मिलकर चंद्रास्वामी पर स्टिंग ऑपरेशन भी किया था |  तीन साल बाद वो एडिटर के रूप में Sunday Observer में काम करने लगे और उसके बाद  The Daily में फिर उन्हें एडिटर का काम मिला |

    Rajat Sharma  रजत जी के जीवन में दूसरा महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब दस साल बाद 1992 में फ्लाइट के सफर में उनकी मुलाकात सुभाष चन्द्र से हुयी | सुभाष जी ने उस समय जी टीवी की शुरुवात की ही थी | जी टीवी भारत का पहला प्राइवेट एंटरटेनमेंट हिंदी चैनल है उससे पहले टीवी में दूरदर्शन के अलावा कोई चैनल नही था | सुभाष की एक दिलचस्प इंटरव्यू कार्यक्रम की तलाश में थे जिसमे वो सेलिब्रिटीज को बुलाकर उनसे सवालात करे | रजत जी उस फ्लाइट में उनको आप की आदालत का रफ़ आईडिया दिया था | इसके बाद कुछ समय तक उनसे मुलाक़ात नही हुयी थी |

    कुछ दिनों बाद सुभाष जी ने Rajat Sharma रजत जी को अपने ऑफिस में बुलाया और कहा “मै तुमको अपने शो का होस्ट बनाना चाहता हु ” | रजत जी को बिलकुल भी विश्वास नही हुआ क्योंकि इससे पहले टीवी पर आने के बारे में उन्होंने सपने में भी नही सोचा था | उनको उस समय लगा कि उनके पिताजी द्वारा कही बात अब सच होने जा रही है | Rajat Sharma रजत जी तुरंत राजी हो गये और 12 फरवरी 1993 को आप की अदालत का पहला शो रिकॉर्ड हुआ था | अब इससे पहले Rajat Sharma रजत जी ने कभी टीवी पर कोई प्रोग्राम नही किया था तो वो इसके लिए रिसर्च काफी कर रहे थे | अब ये तय किया गया कि सुबह 10 बजे से 12 बजे तक रिहर्सल करेंगे और 12:30 बजे पहला प्रोग्राम खुशवंत सिंह के साथ रिकॉर्ड होना था और उसी दिन दूसरा प्रोग्राम लालू यादव का करना तय किया गया था |

    अब उस दिन जब सब तैयारी हो गयी थी तब सुबह 11 बजे लालू यादव का फ़ोन आया कि “शाम को कुछ काम के कारण हम नही आ सकते है इसलिए यदि अभी समय हो तो इंटरव्यू ले लो “| अब रजत जी घबरा गये क्योंकि उस समय तक उन्होंने ज्यादा तैयारी भी नही की थी | उस समय लालू यादव बड़े नेता थे और वो इस इंटरव्यू को मिस नही करना चाहते थे इसलिए रजत जी ने लालू यादव को आने को बोल दिया | अब लालू यादव आ गये लेकिन रजत की इतनी तैयारी नही हो पायी थी इस कारण घबरा रहे थे | अब जब इंटरव्यू शुरू होने लगा तब लालू यादव ने रोकते हुए कहा कि “नया शो है नारियल तो फोड़ो ” | तब कही से नारियल लाया गया और स्टेज के बीच में लालू यादव ने नारियल फोड़ दिया जिससे पानी फर्श पर बिखर गया तब उसे साफ़ करने में तोडा ओर समय लग गया |

    इसके बाद इंटरव्यू शुरू हुआ और सवाल जवाब के बीच पहली रेकॉर्डींग पुरी हो गयी | इंटरव्यू खत्म होने पर रजत जी को चैन की साँस आयी | इसके बाद एक से बढकर एक नेता और कलाकार आप की अदालत में आये जिनको रजत जी ने पसीने ला दिए थे | इस शो की बदौलत आज रजत जी मीडिया की दुनिया में शीर्ष पर पहुच गये | इसके बाद उन्होंने सुभाष जी से बात कर न्यूज़ चैनल शुरू करने की बात की | 1995 में Rajat Sharma रजत जी ने पहला प्राइवेट बुलेटिन जी न्यूज़ पर चालु किया |

    इसके बाद Rajat Sharma के जीवन का तीसरा मोड़ तब आया जब उन्होंने अपने खुद का न्यूज़ चैनल शुरू करने का विचार बनाया जिसको उन्होंने देश के नाम पर इंडिया टीवी रखकर 2004 में लांच किया | इंडिया टीवी शुरूवाट में केवल सीरियस खबरे दिखाता था जिसमे महिला कल्याण या पशु कल्याण जैसे मुद्दे हुआ करते थे | अब उन्होंने इंडिया टीवी न्यूज़ चैनल की शुरुवात तो कर दी लेकिन शुरवात के दो सालो में ही उनके पास पैसो की कमी होने लग गयी थी | उस समय उन्होंने अपनी सारी प्रॉपर्टी बेचकर लोगो की त्नखाव्ह निकाली थी | इसके बाद उनके पास दो विकल्प रह गये थे कि या तो हार मानकर इस चैनल को बंद कर दे या कुछ बदलाव करे |

    2008 में उन्होंने अपने न्यूज़ चैनल में बदलाव करना शुरू किया और गम्भीर मुद्दों के अलावा लोकप्रिय खबरे भी दिखाना शुरू कर दिया | अब धीर धीरे चैनल की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी और आठ महीनों में वो देश का दूसरा सबसे बड़ा न्यूज़ चैनल बन गया | अब उनके पास पैसो की भी कोई कमी नही रही | जब 2009 में इंडिया टीवी शिखर पर पहुच गया तब उन्होंने फिर गम्भीर मुद्दों पर न्यूज़ देना शुरू कर दिया जिसे लोगो ने अपना लिया | Rajat Sharma रजत जी ने जी टीवी से अपने नाटक आप की अदालत को इंडिया टीवी पर शिफ्ट कर लिया जो हर शनिवार को रात 10 बजे प्रसारित होता है जिसमे देश की जानी मानी हस्तिया आती है | 2015 में रजत शर्मा Rajat Sharma  को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार की तरफ से पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया |

    14 सित॰ 2016

    शिल्पकार की सफलता का रहस्य

    By: Successlocator On: सितंबर 14, 2016
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  • शिल्पकार की 

    सफलता का रहस्य


    एक जिज्ञासु व्यक्ति एक प्रसिद्ध चित्रकार व शिल्पकार से मिलने गया। उसने शिल्पकार की कला की खूब सराहना की और उससे पूछा, च्मैं जानने आया हूं कि इस कला में आप इतने निष्णात कैसे हैं? मैं यह रहस्य जानना चाहता हूं। कोई तो ऐसा सिद्धांत या दर्शन होगा, जो आपको यह अनूठा काम करने के लिए प्रेरित करता होगा?
    शिल्पकार ने कहा, अगर तुम सचमुच जानना चाहते हो, तो तुम्हें कुछ समय यहीं रुकना पड़ेगा और
    जो मैं कहूं वह करना पड़ेगा। शिल्पकार ने उसे घर का काम करने में लगा दिया- सफाई करना, खाना बनाना, कपड़े धोना इत्यादि काम वह चुपचाप हफ्ते भर तक करता रहा। एक हफ्ते बाद चित्रकार उसके पास आया और
    बोला, च्मुझे लगता है, जो प्रश्न लेकर तुम आए थे, उसका उत्तर मिल गया होगा और शायद मेरा वह दर्शन भी तुम सीख गए होगे।
    वह व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर बोला, च्महोदय, इतने दिनों तक मैं आपके कहने पर यहां रुका रहा और बिना कुछ कहे सारा काम करता रहा, लेकिन मेरी इन कामों में रुचि नहीं है, मुझे तो आपकी कला के बारे में जानना था, जो आपने अभी तक नहीं बताया। शिल्पकार ने कहा, च्तुमने हर काम एक शब्द बोले बिना दत्तचित्त होकर किया न? यही तो मेरी कला और सफलता का रहस्य है। मैं तुम्हें यही बताना चाहता था।
    कथा मर्म : जो व्यक्ति काम को दत्तचित्त होकर चुपचाप करता है, उसे सफलता पाने से कोई नहीं
    रोक सकता।

    13 सित॰ 2016

    बिड़ला ग्रुप की सफलता की कहानी आम आदमी की जुबानी

    By: Successlocator On: सितंबर 13, 2016
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  • लोगों की सोच को भांपकर मार्केट में अपने पांव पसारने की कला जिस खिलाड़ी को आती है उसे मार्केट का किंग कहा जाता है। वो कहते हैं न कि बाजार की अपनी एक अलग खासियत होती है, यह उन्हीं खिलाड़ियों को पसंद करती है जो टी-20 के मौसम में सहवाग, 50-50 की पिच पर सचिन और लंबे फार्मेट में द्रविड जैसा टैलेंट रखता हो। अगर आप यह तय कर लें कि मार्केट में खरीददारों को जो कुछ भी भाता या पसंद आता हो आप उस चीज को हर किसी के लिए उपलब्ध कराने का प्रबंध कर देंगे तो मार्केट में आपका डंडा चलना तय है। आपको जानकर हैरानी होगी कि आदित्य बिड़ला ग्रुप के बैनर तले तमाम ब्रांड के कपड़े बाजार में मौजूद रहते हैं और सभी के सभी उतनी ही शिद्दत के साथ खरीदे जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है इसे समझने के लिए आपको थोड़ा धीरज धरना होगा। हम आपको एक ऐसी छोटी कहानी सुनाएंगे जो यूं तो टैक्सटाइल सेक्टर में बिड़ला ग्रुप की सफलता का आईनाभर है, लेकिन यह आपको बाजार के बाजारवाद को समझाने के लिए काफी है। इस कहानी के जरिए समझिए क्यों बिड़ला ग्रुप आज भी लोगों का पसंदीदा ब्रांड बना हुआ है।

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    कुछ सालों पहले किसी कस्बे में सुरेश की मिठाई की एक दुकान हुआ करती थी। दुकान में पेठा बेचा जाता था। बिजनेस अच्छा खासा चल रहा था और कस्बे के लोग तेजी से इस दुकान की और बढ़ रहे थे। दुकान पर बढ़ती भीड़ को थामने के लिए सुरेश ने इसी कस्बे में एक और मिठाई की दुकान खोल दी। इस दुकान ने उम्मीद से बेहतर काम किया और सुरेश ने दो साल बाद एक और दुकान खोलने की योजना बना ली। लेकिन इसी बीच सुरेश के दिमाग में गजब का आइडिया आया। उसने सोचा कि अगर कुछ लोग पेठे के 10 पैसे दे सकते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो और अच्छे पेठे के लिए 15-20 पैसे देने को भी तैयार होंगे। ऐसे में अगर वो दुकान नहीं खोलेगा तो कोई और इस दुकान को खोल लेगा। सुरेश ने पूरी तैयारी कर ली थी और वो दुकान खोलने वाला ही था, लेकिन सुरेश के पिता ने बताया कि लोग पेठे के कारण तुम्हारी दुकान की तरफ आकर्षित हुए हैं और ये वाजिब दामों में उपलब्ध है। इसलिए नई दुकान में इस थोड़े महंगे पेठे के लिए अन्य ग्राहकों का आना थोड़ा मुश्किल लगता है। सुरेश के पिता ने सुझाव दिया कि बेटा तुम्हे विकास मिठाई नाम से एक दुकान खोलनी चाहिए। सुरेश ने बताया कि यह आइडिया काम कर गया और इसके बाद उसने इन दोनों ब्रांड्स की कई और दुकाने खोल दीं।

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    सुरेश ने बताया कि उसके पिता एक चतुर व्यापारी हैं और ठीक एक साल पहले उन्होंने यह भांपा कि जो लोग 10 पैसे का पेठा खरीदते हैं वो अपने बेहतर पेठे के लिए 15 पैसे देने को तो तैयार हैं लेकिन वो 20 पैसे हरगिज नहीं देंगे। दुकान पर 10 पैसे का पेठा लेने वालों की तादात हरदम बनी रहती है। इसी वक्त सुरेश के पिता को एक आइडिया सूझा और उन्होंने उन लोगों के लिए एक अलग से दुकान खोल दी जो पेठे के लिए 15 पैसे देने को तैयार हैं। इस नई चेन का नाम रखा गया आनंद मिठाई। इस तरह से सुरेश के परिवार ने मिठाई की तीन चेन खोल दीं। सुरेश ने बताया कि सालभर बीतने के बाद उसने युवाओं को आकर्षित करने के लिए चाकलेट और अन्य स्पेशल मिठाइयों को लेकर एक नई चेन खोलने की योजना बनाई। इस नई चेन का नाम रखा गया लक्जरियस स्वीट।
    इस कहानी को सुनकर आप इसका मर्म तो समझ ही गए होंगे। अगर नहीं समझे तो चलिए आपको समझा देते हैं.....


    दरअसल यह पूरी लड़ाई टार्गेट ऑडियंस को लेकर है
    पेठा कुछ भी नहीं है, लेकिन यह बाजार में मुख्यधारा के लोगों की पसंद बना हुआ है जिसका नाम Peter England
    विकास मिठाई  Van Heusen ब्रांड के जैसी है, जो आमतौर पर लक्जरी कपड़ों की डीलिंग करती है।
    वहीं आनंद मिठाई Allen Solly के जैसी है, जो इन दोनों वर्ग के लोगों के इतर की पसंद है।
    वहीं Louis Philippe बाजार की लक्जरियस स्वीट की दुकान है और लोगों को लक्जरी फॉर्मल और कैजुअल कपड़े उपलब्ध करा रही है।

    लब्बोलुआब- सुरेश और उसके पिता की इस छोटी सी कहानी ने बाजार के पूरे गणित को समझा दिया।

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    14 अप्रैल 2016

    कहानियाँ, कैसे लोग होते हैं सफल Real Businessman Motivational Story

    By: Successlocator On: अप्रैल 14, 2016
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  • कहा जाता है कि जब कोई इंसान अपनी लगन, एकाग्र लक्ष्य और पूरे दृंढ संकल्प के साथ जब कोई काम करता है तो उसको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। जब परिस्थितियाँ आपके विपरीत हों और आपको कोई उम्मीद की किरण ना दिख रही हो तो इंसान को धैर्य और सब्र नहीं खोना चाहिए और परिस्थियों के आगे हार नहीं माननी चाहिए और लगातार सफलता के लिए प्रयास करते रहना चाहिए।

    Su-Kam Inveter, आज ये कंपनी विश्व विख्यात है और करीब 70 से ज्यादा ज्यादा देशों में इसका कारोबार फैला है और हाल ही में इसके मालिक “कुंवर सचदेव जी” ने बताया की कम्पनी का करीब 29 बिलियन डॉलर (1836 अरब रुपए) का टर्नओवर है। लेकिन शायद कोई ये नहीं जानता कि इस कम्पनी की शुरुआत एक छोटी सी दुकान के रूप में हुई थी।

    आसान नहीं था रास्ता

    जब कुंवर सचदेव दसवीं कक्षा में पढ़ते थे, उस समय वो अपने भाई के साथ मिलकर घर घर जाकर पेन बेचा करते थे जिससे कुछ पैसे कमाया करते थे। उन्होनें कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वो इतनी बड़े स्तर पे बिज़निस(Business) करेंगे। बाद में उन्होंने वो काम छोड़कर एक टीवी केबल वाले के पास नौकरी कर ली और घर घर जाकर टीवी केबल लगाते थे। काफी समय संघर्ष भरा रहा लेकिन बाद में उन्होंने नौकरी से दस हजार रुपये इकट्ठे किये और अपनी एक खुद की दुकान खोली जिसका नाम रखा “Su-Kam” और फिर ये खुद के केबल distribute करते थे।
    कैसे बने इलेक्ट्रॉनिक के किंग

    उन दिनों inverter बनाने की कम्पनियां विदेशों में भी नहीं थी। एक दिन कुंवर सचदेव जी को विचार आया कि कि क्यों ना एक इन्वर्टर बनाने का काम शुरू किया जाये। बस उसी दिन उनकी सफलता की शुरुआत हुई, उन्होंने कई अच्छे इंजीनियरों को अपने साथ जोड़ा और बहुत छोटे स्तर पे inverter बनाने का काम शुरू किया। काफी लोगों ने उन्हें रोका भी कि आपको इस बिजनिस की कोई समझ नहीं है तो आप इसमें सफल नहीं हो पाएंगे लेकिन वो अपनी जिद पे अड़े रहे और बहुत जल्द इंजीनियरों की मदद से काफी अच्छे डिजाइन के इन्वर्टर मार्किट में लाये और सौभाग्यवश लोगों को इन्वर्टर बहुत पसंद आये। धीरे धीरे उनका बिज़निस अच्छा चलने लगा और जल्द ही पुरे भारत में उन्होंने सफलतापूर्वक अपना व्यापार जमा लिया।

    एक सलाह

    कुंवर सचदेव जी युवाओं के लिए एक सन्देश देना चाहते हैं। वो बताते हैं कि आज के युवा हताश रहते हैं कि उनके पास business करने के लिए पैसे नहीं हैं, या उनके पास अच्छी डिग्री नहीं है। लेकिन कुंवर सचदेव जी कहते हैं कि केवल स्कूल की पढाई या डिग्री लेकर कोई बिज़नेसमैन नहीं बन सकता उसके लिए अच्छी समझ, मेहनत और लगन की जरुरत होती है। अगर आपके अंदर भी वो लगन और सफल बनने का जज्बा है तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती।

    एक सन्देश

    मित्रों अक्सर हम लोग ऐसे सफल लोगों की कहानियाँ अख़बार या पत्रिका या टीवी पर अक्सर देखते हैं और प्रभावित भी होते हैं लेकिन केवल कुछ समय के लिए उसके बाद हम फिर से अपनी पुरानी जिंदगी जीने में लग जाते हैं। आज मैं चाहता हूँ कि आप भी अपने अंदर की चिंगारी को बुझने ना दें, आप भी अपने लिए कुछ बड़ा सोचें। जैसा कि कुंवर सचदेव जी ने कहा- अगर आपके अंदर भी लो लगन और सफल बनने का जज्बा है तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती। तो आपको इस लेख से क्या शिक्षा मिली और आपने अपने लिए क्या बड़ा सोचा हमें नीचे कॉमेंट में जरूर बताएं।
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    10 अप्रैल 2016

    सफलता की संभावनाएं हर जगह मौजूद हैं | possibility impossibility Best Hindi Story

    By: Successlocator On: अप्रैल 10, 2016
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  • एक बार एक साबुन बनाने वाली कंपनी ने अपने साबुन की बिक्री को बढ़ाने के लिए कंपनी की कुछ नई ब्रांच खोलने के बारे में सोचा।

    कंपनी को कुछ ऐसी जगहों की तलाश थी जहाँ वह अपनी नई ब्रांच खोल सके।

    कंपनी ऐसी जगह तलाश करना चाहती थी जहाँ उनके साबुन के बिकने की बहुत अधिक संभावनाएं मौजूद हों।

    ऐसी जगहों को तलाश करने के लिए कंपनी ने अपने दो अच्छे एग्जीक्यूटिव (executives) को भेजा।

    दोनों एग्जीक्यूटिव एक ऐसे स्थान पर गए जहाँ सभी लोग अपने दैनिक जीवन में साबुन का प्रयोग करते थे। साबुन की अधिक मांग होने के कारण उस जगह पर बहुत सी साबुन की कंपनी पहले से ही थीं।

    वहां उन दोनों ने अपने-अपने तरीके से सर्वे (Survey) किया और बाद में अपनी कंपनी के सामने अपनी-अपनी रिपोर्ट पेश की।

    पहले एग्जीक्यूटिव ने अपने सर्वे में लिखा था, "यहाँ पर बहुत सी साबुन बनाने वाली कंपनी पहले से ही स्थापित हैं जो यहाँ के सभी लोगों को साबुन सप्लाई कर रहीं हैं। साबुन की कंपनियों में बहुत कम्पटीशन है। मेरे अनुसार ऐसी जगह पर एक नई साबुन की कंपनी लगाना सही नहीं होगा। साबुन नहीं बिकेंगे और कंपनी को घाटा हो सकता है।"

    अब कंपनी के मालिक ने दूसरे एग्जीक्यूटिव की रिपोर्ट पढ़ी जिसमे लिखा था, "यहाँ के सभी लोग साबुन का बहुत अधिक प्रयोग करते हैं। साबुन के बिकने की यहाँ संभावनाएं बहुत अधिक है। इसी वजह से बहुत सी साबुन की कंपनियां यहाँ स्थापित हो चुकी हैं। यदि हमारी कंपनी अच्छे क्वालिटी का साबुन बनाकर यहाँ बेचे तो साबुन बहुत बिकेंगे और कंपनी को बहुत अधिक फायदा होगा।"

    कंपनी के मालिक को दूसरे एग्जीक्यूटिव की रिपोर्ट ज्यादा अच्छी लगी।

    अतः कंपनी ने उस जगह एक नई ब्रांच बना दी। वहां अच्छी क्वालिटी का साबुन बनाया गया जो लोगों को बहुत पसंद आया। कंपनी के साबुन उम्मीद से अधिक बिकने लगे और इससे कंपनी को बहुत अधिक फायदा हुआ।
    अब कंपनी ने अपने दो एग्जीक्यूटिव को किसी दूसरे स्थान पर भेजा।

    दोनों एग्जीक्यूटिव जब वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि यहाँ के लोग साबुन का प्रयोग ही नहीं करते हैं। इसी वजह से यहाँ कोई साबुन बनाने वाली कंपनी भी नहीं है।

    दोनों एग्जीक्यूटिव ने अपने-अपने सर्वे किये और अपनी कंपनी को रिपोर्ट पेश की।

    पहले एग्जीक्यूटिव ने लिखा था, "यहाँ पर कोई भी व्यक्ति साबुन का इस्तेमाल नहीं करता है। शायद इसी वजह से यहाँ कोई भी साबुन बनाने की कंपनी नहीं है। मेरे अनुसार जब यहाँ के लोग साबुन खरीदते ही नहीं है तो यहाँ अपनी कंपनी की ब्रांच खोलना बिलकुल भी सही नहीं होगा।"

    अब दूसरे एग्जीक्यूटिव की रिपोर्ट को पढ़ा गया जिसमे लिखा था, "यहाँ कोई भी साबुन का प्रयोग नहीं करता। शायद यही सोचकर किसी भी कंपनी ने अपनी ब्रांच यहाँ नहीं खोली है। लेकिन मेरे अनुसार यहाँ पर साबुन के बिकने की बहुत अधिक सम्भावनाएं मौजूद हैं। यदि यहाँ के लोगों को साबुन के प्रयोग करने से होने वाले फायदों के बारे में बताया जाये तो सभी लोग साबुन खरीदेंगे जिससे हमारी कंपनी को एक बहुत बड़ा मार्केट मिल जायेगा जिससे कंपनी को बहुत अधिक फायदा होगा।"

    अब यहाँ भी कंपनी के मालिक ने दूसरे एग्जीक्यूटिव की रिपोर्ट को सही माना और एक ब्रांच उस जगह बना दी। साथ ही साथ कुछ ऐसे लोगों को वहां भेजा जो साबुन से होने वाले फायदों को वहां के सभी लोगों को सही से बता सकें।

    इसका परिणाम यह हुआ कि वहां के लोगों को साबुन के प्रयोग के बारे में पता लगा और लोग साबुन को इस्तेमाल करने लगे जिससे कंपनी को बहुत फायदा हुआ और एक बहुत बड़ा Market कंपनी के हाथ लग गया।
    दोस्तों! इस कहानी से हमें यह पता चलता है कि सम्भावनाएं (Possibilities) हर जगह और हर व्यक्ति के अंदर मौजूद हैं। आवश्यकता तो बस उन संभावनाओं को खोजने की है।

    कहानी में Company द्वारा भेजे गए दूसरे एग्जीक्यूटिव ने साबुन को बिकने की संभावनाओं का पता लगाया। दूसरे एग्जीक्यूटिव ने दोनों स्थानों पर अपने तरीके से साबुन के बिकने की संभावनाओं को खोजा और यह Proof कर दिया कि यदि कोई भी व्यक्ति चाहे तो उसे प्रत्येक परिस्थिति (Situation) में सफल होने की संभावना मिल जाएगी।

    आपके अंदर किसी भी क्षेत्र में Success होने की सभी सम्भावनाएं मौजूद होती हैं।

    बचपन से ही आपके अंदर सारी सम्भावनाएं मौजूद होती हैं, लेकिन निर्णय (Decision) आपका होता है कि आप क्या बनना चाहते हैं। कोई इंजीनियर बनना चाहता है, कोई डॉक्टर बनना चाहता तो कोई कुछ और बनना चाहता है। आपके अंदर कुछ भी बनने की सभी सम्भावनाएं होती हैं।

    आप जो चाहें बन सकते हैं। बस एक बार आपको निर्णय लेना होगा कि आप क्या बनना चाहते है। फिर यदि आप उसी क्षेत्र में सही दिशा में कठिन परिश्रम (Hard work in right direction) करते हैं तो आप सफल हो सकते हैं। या आप आज जिस क्षेत्र में सफल हैं तो इसका मतलब है कि आपने उसी क्षेत्र में संभावनाओं को खोजा जिसकी वजह से आप सफल हो पाए।

    किसने सोचा था कि वास्तविक दुनिया (Real world) से भी बड़ी एक काल्पनिक दुनिया (Fantasy World) होगी। लेकिन जब ऐसी संभावनाओं को खोजा गया तो ऐसी दुनिया को भी खोज लिया गया है जो आज इंटरनेट के रूप में हमारे सामने मौजूद है।

    यह एक ऐसी दुनिया है जो वास्तविक दुनिया से भी बड़ी है।

    आपके अंदर भी सफल होने की सभी सम्भावनाएं मौजूद हैं।

    इस बात की पूरी सम्भावना है कि आप चाहें तो अपने मनपसंद Career में सफल हो सकते हैं।

    इस बात की पूरी सम्भावना है कि आप चाहें तो अमीर या करोड़पति (Rich or Millionaires) बन सकते हैं।

    इस बात की पूरी सम्भावना है कि आप चाहें तो एक Famous person बन सकते हैं।

    इस बात की पूरी सम्भावना है कि आप जो चाहें वह बन सकते हैं।

    असफलता (Failure) के बाद सफलता (Success) की सभी सम्भावनाएं आपके अंदर मौजूद हैं।

    हार (Defeat) के बाद जीत (Victory) की सभी सम्भावनाएं आपके अंदर मौजूद हैं।

    प्रत्येक निराशा (Disappointment) को आशा (Hope) में बदलने की सभी सम्भावनाएं आपके अंदर मौजूद हैं।

    गरीब जीवन (Poor life) को हटाकर एक अमीर जीवन (Rich life) जीने की सभी सम्भावनाएं आपके अंदर मौजूद हैं।

    मैं तो कहता हूँ कि एक साधारण इंसान (Simple person) से अमेरिका के राष्ट्रपति (President of America) बनने की सभी सम्भावनाएं आपके अंदर मौजूद हैं।

    आवश्यकता तो केवल उन संभावनाओं को खोजने की है।

    5 मार्च 2016

    सफलता की कुंजी

    By: Successlocator On: मार्च 05, 2016
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  • सफलता की कुंजी

    हमारे धर्म-ग्रन्थ मे एक बड़ा सुन्दर मंत्र इन शब्दों मे मिलता है-"उठो, जागों और जब तक ध्येय की प्राप्ति न हो, प्रयत्न करते रहों।" जीवन मे सफलता की यही कुंजी है। बिना सक्रियता के कुछ नही हो सकता। हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे तो क्या मिलेगा? दुनिया उसी को प्यार करती है, उसी को मान देती है, जो मेहनत करता है ओर खरी कमाई करके खाता है। आदमी का काम प्यारा होता है चाम नही।

    कुछ लोग बड़ी-बड़ी चीजों के चक्कर मे छोटी-छोटी चीजों की ओर ध्यान नही देते। वे भूल जाते है कि जो छोटी चीजों को नही सॅभाल सकता, वह बड़ी चीजों के योग्य नही बन सकता।

    एक बार गांधीजी की एक छोटी-सी पैसिल इधर-उधर हो गयी। उसकी तलाश मे उन्होने दो घटें खर्च किये और जब वह मिल गयी, तब उन्हे चैन पड़ा। वह जानते थे कि छोटी चीजों के प्रति लापरवाही हुई कि फिर बड़ी चीजों के लिए भी आदमी मे वह दुर्गुण आ जाता है।

    हमारी सफलता इस बात मे है कि हम सावधान रहकर, जो भी काम हमारे हाथ मे हो, उसे अच्छी तरह पूरा करें। हिमालय की चोटी पर च़ढ़ने के अवसर कम ही आते है, लेकिन हाथ के काम को कुशलता से करने का मौका तो हर घड़ी सामने रहता है।

    रूसों संसार का एक महापुरूष हो गया है। उसने लिखा, "जो मनुष्य अपने कर्त्तव्य को अच्छी तरह से करने की शिक्षा पा चुका है, वह मनुष्य से सम्बन्ध रखने वाले सभी कामों को भली-भॉती करेगा। मुझे इसकी चिन्ता नही कि मेरे शिष्य सेवा, धर्म या न्यायलय के लिए बनाए गए है। समाज से सम्बन्ध रखने वाले किसी काम के पहले प्रकृति ने हमें मानव-जीवन से सम्बन्ध रखने वाले काम करने के लिए बनाया है। यही मैं अपने शिष्य को सिखाऊँगा। जब उसे यह शिक्षा मिल चुकेगी, तब वह न सिपाही होगा, न पादरी होगा और न वकील ही। वह पहले मनुष्य होगा, फिर और कुछ।"

    कुछ लोग जीवन की सफलता पैसे ऑंकते है। जिसने अधिक कमाई कर ली, उसके लिए माना जाता है कि वह जिन्दगी मे सफल रहा। पर धन सफलता की असली कसौटी नही है। धन साधन है, जीवन का साध्य नही हो सकता। यदि पैसा ही सबकुछ होता तो बुद्ध, महावीर, गांधीजी आदि महापुरूष क्यों गरीबी का जीवन अपनातें? बुद्ध और महावीर तो राजा के बेटे थे, राज्य के अधिकारी थे, लेकिन उन्होने राज-पाट के वैभव से मुँह मोड़कर उस रास्ते को अपनाया, जिससे ढाई हज़ार वर्ष बाद आज भी वे जीवित है और जब तक मानव-जाति है, आगे भी जीवित रहेगें। गांधीजी को कौन-सी कमी थी? लेकिन उन्होने सादगी का जीवन अपनाया। आज सारी दुनिया उन्हे प्यार करती है। उनका मान करती है।

    आदमी को निराशा तभी होती है, जब वह आशा रखता है। जो काम वह करता है, उसके फल मे उसकी आसक्ति रहती है। गीता बताती है-"काम करों, पर फल की इच्छा मत रक्खों।" मेहनत कभी अकारथ नही जाती। फलों के पेड़ों पर फल आते ही है। लेकिन फलों पर हमारी इतनी निगाह रहती है कि पेड लगाने के आनन्द को हम अनुभव नही करते। अच्छी तरह से काम करने का अपना निराला ही उल्लास होता है।

    कुछ लोग कहते है, यह भी कोई जिन्दगी है कि हर घड़ी काम करते रहों। बहुत दिन जीने के लिए आराम बड़ा जरूरी है। ऐसा कहने मे एक बुनियादी दोष है। हर घड़ी काम करने का मतलब यह नही है कि आदमी कभी आरम ही न करे। उसका मतलब है, आदमी कर्मठ रहे, आलस न करें। सच बात यह है कि निष्क्रिय जीवन से बढ़कर दूसरा अभिशाप नही है। जो लोग क्रियाशील रहते है, वे काम करने का सन्तोष पाते है और अपनी प्रसन्नता से धरती का बोझ हल्का करते है। इसके विपरीत जो काम से बचते है, वे स्वयं तो परेशान होते ही है, समाज मे भी बडा दूषित वायुमण्डल पैदा करते है। कर्ममय जीवन दूसरो पर अच्छा असर डालता है, आलसी दूसरे को आलसी बनाता है।

    बचपन मे अंग्रेजी की एक बड़ी सुन्दर कविता पढ़ी थी। कवि कहता है, "उठो, दिन बीता जा रहा है और तुम सपने लेते हुए पड़े हुए हो! दूसरे लोगो ने अपने कवच धारण कर लिए हैऔर रणभूमि मे चले गये है॥ सेना की पंक्ति मे एक खाली जगह है, जो तुम्हारी राह देख रही है। हर आदमी का अपना कार्य करना होता है।"

    मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, उसके कर्त्तव्य बढ़ते जाते है। वह जितनी खूबी से उनका पालन करता है, उतना ही वह अच्छा नागरिक बनता है और समाज को सुखी बनाता है।

    हर आदमी के लिए ऊँचाई पर स्थान है, लेकिन वहॉँ पहँचता वही है, जिसके अन्तर मे आत्म-विश्वास होता है, हाथ-पैरों मे ताकत होती है, निगाह मे ऊँचाई होती है ओर हृदय में सबके लिए प्रेम और सहानुभूति का सागर उमड़ता रहता है।

    ऐसा आदमी जानता है कि उसके ऊपर सदा निर्मल आकाश है। अगर कभी बादल घिर भी आते है तो वे अधिक समय नही टिकते है। अपने लक्ष्य पर आँख रखकर मज़बूती से बढ़े चलना इंसान का सबसे बड़ा कर्त्तव्य है।

    4 मार्च 2016

    अपने पर भरोसा

    By: Successlocator On: मार्च 04, 2016
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  • अपने पर भरोसा

    आदमी कितनी भी मेहनत कर ले, अगर उसे अपने पर भरोसा नही है तो वह जीवन मे सफल नही हो सकता। बाहरी साधन इंसान के लिए जरूरी होते है, कुछ हद तक मदद भी करते है, लेकिन बिना आत्मविश्वास के उसकी गाड़ी नही बढ़ सकती। अपने पैरो की ताक़त के बिना आदमी दूर तक नही जा सकता।

    अपने पर भरोसे के मयने होते है-अपनी शक्तियों पर भरोसा। किसी भी काम को करने वाले आदमी मे अगर यह विश्वास है कि उसे जरूर पूरा कर सकेगा तो वह पूरा होकर ही रहेगा। जन्म से सारे गुण को पैदा कर सकता है। आत्म-विश्वास भी काम से आता है। गांधीजी बचपन मे डरपोक थे, लेकिन आगे चलकर ऐसे निडर बने कि दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें नही डरा सकी।

    आत्म-विश्वास सौ रोगो की एक दवा है। आत्म विश्वास है तो आपको काम के लिए नहीं भटकना पड़ेगा, भयंकर बीमारियॉँ नही पडेंगी, चिन्ताऍ आपका खून नहीं चूसेंगी ओर दुनिया की असफलताओं की वेदना आपको नही उठानी पड़ेगी। आत्म-विश्वास वह शक्ति है, जो असम्भव को भी सम्भव करके दिखा देती है।

    आत्म-विश्वास दृढ़ इच्छा-शक्ति सेउत्पन्न होता है। इच्छा-शक्ति वैसे हरकिसी मे होती है; किन्तु बहुत से लोगों मे वह सोती पडी रहती है। वे जानते ही नही कि उनके अन्दर शक्ति है। जो उसे पहचान लेते है, उनमें यह विश्वस पैदा हो जाता है कि वे जो कुछ करेगें, अच्छा ही होगा। ऐसे आदमी हौसले से काम करते जाते है ओर सफलता हर घड़ी उनके दरवाजें पर खड़ी रहती है।

    एक राजा पर उसके दुश्मन ने हमला किया। राजा ने उसका मुकाबला किया, लेकिन वह हार गया। अपने राज्य से भागकर वह एक गुफा मे जा छिपा। राज्य को वापस पाने की उसे कोई आशा न रही। गुफा मे बैठकर उसे बीते दिनों की याद सताने लगी। अकस्मात उसकी निगाह सामने की दीवार पर गयी। देखता क्या है कि एक कीड़ा बार-बार ऊपर चढ़ने की

    कोशिश कर रहा है। चढ़ता है, गिर पड़ता है। इस तरह वह छ: बार चढ़ा ओर छ: बार गिरा, लेकिन उसने अपना प्रयास नही छोड़ा। राजा बड़ी उत्सुकता से उसे देखता रहा। सातवी बार उसकी कोशिश सफल हुई। वह ऊपर पहुंच गया। राजा सोचने लगा-इस छोटे-से कीडे ने हार नही मानी और ऊपर पहुँचकर ही रहा। आखिर मैं तो आदमी हूं, कोशिश करूँ तो कोई वजह नही कि मेरी जीत न हो। यह सोचकर वह बाहर निकला और हिम्मत के साथ अपनी बिखरी सेना को इकटठा करके उसने फिर अपने राज्य को जीतने की कोशिश की। उसे अब भरोसा हो गया था कि उसे अवश्य सफलता मिलेगी और उसकी बात सही निकली।

    राजा ने देखा, कीड़े ने हार नहीं मानी।

    पं. जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही लिखा है, "हमारी कामयाबी इस बात मे नही है कि हम कभी गिरें ही नही। हमारी कामयाबी इसमें है कि गिरते ही हम हर बार उठकर खड़े हो जायें।"

    कुछ लोग आत्म-विश्वास को घमण्ड मानते हैं। यह गलत है। दोनो मे जमीन आसमान का अन्तर है। आत्म-विश्वास आदमी का गुण है, जो उसे काम रकने का हौसला देता है। घमण्ड दुर्गुण है। वह आदमी को गिराता है। उससे आदमी के सारे गुणों पर पर्दा पड़ जाता है ओर समाज मे सब लोग उसे तिरस्कार की निगाह से देखते है। घमण्ड आदमी का बहुत बड़ा दुश्मन है।